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Wednesday, August 15, 2007

चित्र -- मराठी कथा से अनुवाद भाग 4/4

चित्र -- मराठी कथा से अनुवाद भाग 4/4
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मूल मराठी कथा -- परशुराम देशपांडे
हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले

॥॥॥॥॥॥

भोलानाथ की कॉमेंट्री चालू थी-- यहाँ राजकवि था केशव और राजनर्तकी गणेशकुँवर। वह भी कवयित्री थी। उसका बडा सम्मान था। रानी ने उसे राजघराने की स्त्र्िायोंकी बराबरीमें पालकी का सम्मान दिया था। अन्य राजस्त्र्िायोंकी तरह वह भी सुरंग के रास्ते बेतवा नदी पर नहाने जा सकती थी। राजकवि केशव भी राजा की पंगत मे बैठता था। बहुत ही कलाप्रिय घराना था।

तभी प्रभुदास वहाँ पहुँचा। हमें भूतकालसे वर्तमान मे खींचते हुए उसने प्रस्ताव रख्खा-- आशुतोष, तेरी और अमिता की शादी के लिये इससे अच्छी जगह क्या हो सकती है? यहाँ अयोध्या से पधारे स्वयं रामचंद्र जी हैं।पंडित का काम करने के लिये मैं और भोलनाथ हैं। कन्यादान के लिये नायर और जयंती है। ये सामने इतने बाल बच्चे हैं जो बाराती बन जायेंगे। तू और अमिता अभी इसी पल ब्याह रचा ले। भोलानाथ ने सुर में सुर मिलाया-- हाँ अमिता, मंगल कार्य के लिये हर मुहूर्त शुभ होता है। जयंती ने भी फौरन अमिता का हाथ पकड कर कहा-- मैं कन्यादान के लिये प्रस्तुत हूँ। अमिताने हँसकर मेरी ओर देखा-- आशुतोष, क्या अब भी मुझे माँग भरो सजना कह कर तुम्हारी मिन्नत करनी होगी?

ऐसे अचानक हमले से कोई वीर बुंदेला भी चकरा जाता। मैं भी एक पल को थम सा गया। फिर मन ने कहा ठीक तो है, यहाँ चतुर्भुज नारायण की साक्षी में मैं भी चतुर्भुज हो जाऊँ तो क्या हर्ज है? मैंने हाथ ऊपर उठा दिये-- शरणागत हूँ जो कहोगे मानूँगा। लेकिन शादी से पहले बेतवा नदी के पानी में अपने अपने पाप तो धो लिये जायें।

मेरी बात पर सबको ध्यान आया कि पास मे ही बेतवा नदी कलकल बह रही है। सबको मेरी कल्पना पसंद आई। लेकिन भरी दोपहर नदी स्नान को जाने वाले हम लोगों की बुद्धि पर अगल बगल खडी स्त्र्िायोंको शक होने लगा। उनमें से एक लडका आगे आकर कहने लगा-- 'बाबूजी हम आपको नहानेकी ठीक जगह दिखात हैं। आपको नही मालूम ये बेतवा बडी डायन है। कहीं नुकीले पत्थर होर कहीं हाथी जित्ता गहरा पानी। फिसलन का तो पता ही नही लगत।' बाकी स्त्र्िायाँ और बच्चे उसकी हाँ में हाँ मिलाकर शोर गुल करने लगे। अमिता ने मेरे कान के पास आकर कहा-- आशुतोष, मैं तो इन देहातियों के साथ स्नान करने नही जाती। हमलोग कुछ देर और चुपचाप मंदिर देखते हैं और फिर अकेले ही नदी में चलेंगे।
अमिता का इशारा समझ कर भोलानाथ ने कहा-- ठीक है तो बेतवा नहाने के लिये सब लोग शाम को ही चलेंगे। अगले घंटेभर मे उन बच्चों स्त्र्िायोंके झुंड का कौतुहल समाप्त हो गया। उन्हें लगा हमारे पीछे टाइम गँवाना व्यर्थ है। वे एक एक करके निकलते गये। फिर हम चुपचाप बेतवा नहाने चल पडे। वहाँ से आगे सुदूर कही बेतवापर बाँध बना कर पानी का रोका गया था। पीछे ठहरे पानी के कारण बेतवा का पात्र सचमुच विशाल हो चला था। हमारी एक ओर यहाँ के दिवगंत राजाओंकी मंदिरनुमा समाधियाँ थीं। सामने दूसरे किनारे पर घनी झाडी। ऊपर स्वच्छ नीलिमा लिये आकाश। इन के प्रतिबिम्ब पानीमें थरथरा रहे थे। पानी में कई जगह मानों कौतूहलसे गर्दन उठाये पत्यर दीख रहे थे।

पहले तो हम घुटनों तक पानी में ही नहाते रहे लेकिन नदी का शांत प्रवाह हमें गहराईमे बुला रहा था। नायर और जयंती केवल हाथ पाँव धोकर ही बाहर निकल आये लेकिन प्रभुदास और भोलानाथ अपनी तैराकी का कौशल दिखाने लगे। मैं अपनी स्केचबुक में रेखाचित्र उतारनेमें लगा हुआ था।हम सबके अनजाने में अमिता न जाने कब पानी में उतर कर दूर तक चली गई थी। उसके पुकारने पर मुझे भान हुआ। उसने अपना घागर पानी के ऊपर फैला रख्खा था। उस गोलाकार गुलाबी घागरेमें दोनों बांहें उठाकर मुझे पुकारने वाली अमिता किसी कमल पुष्प की भॉति खिल रही थी। मैंने झटसे नायर के हाथसे कॅमेरा लिया और उसके पांच छ फोटो खींचे।

तभी भोलनाथ की डपट सुनाई दी-- अमिता आगे मत जाना। वहाँ पानी बहुत गहरा है। उसने खिलखिलाकर कहा-- ओके, ओके, बस एक डुबकी लगाकर आ जाती हूँ। भोलानाथने फिर भयभीत आवाज में पुकारा-- अमिता। लेकिन अमिता के कमलपुष्पने अपने आप को समेट लिया था। उसने डुबकी
लगाई तो उस शांत पानी के अंदर से मुझे डुबु डुबु शब्द स्पष्ट सुनाई दिया। और फिर अकस्मात छाई एक भीषण नीरवता।

मैं अवाक्‌ किनारेसे ही देख रहा था। अचानक एक कुशंका ने मेरी बुद्धि को जो अंकुश मारा तो मैं तेजी से पानी में कूद पडा। पीछे पीछे भोलानाथ के तैरने के भी आवाज आई। जैसा भोलानाथ ने कहा वहाँ गहरा दह बना हुआ था। साँस रोक कर मैंने नीचे झाँका तो गहरी तलछट में अमिता नजर आई। उसके घने बाल पानी में शैवालकी तरह लहरा रहे थे। खुद अमिता किसी भ्रूण की तरह हाथ पैर सिकोड कर पानी के एक शिलाखंड पर बैठी हुई थी। दोपहर की किरणें मटमैली होकर भी उसके शरीर को उजागर कर रही थीं।

मेरे हाथ उस तक पहुचते इससे पहले ही मेरी अपनी साँस कमजोर पडने लगी तो प्राणोंने एक झटका देकर मेरे शरीर को ऊपर उछाल दिया। मेरी बाँहों ने उसे पकडने की कोशिश की किन्तु व्यर्थ। भोलानाथ भी किसी तरह उसके शरीर को ऊपर खीचना चाह रहा था लेकिन मेरा थरथराता शरीर उसे भी सहयोग नही दे पा रहा था। मैनें एक आखिरी कोशिश के लिये अपने शरीर को पानी के अंदर झोंक दिया। तभी वहाँ अतल में पडा एक नुकीला पत्थर सन्न ने मेरे माथे से टकराया और रक्त की धार बह निकली। वेदना से तिलमिला कर किसी तरह पानी से ऊपर आया तो प्रभुदास खींचकर मुझे किनारे तक ले गया।

इसी दरमियान जयंती और नायर की चीख पुकार सुनकर मछुआरों के बच्चे भागते हुए आये। तीन चार ने मिलकर किसी तरह अमिता के शरीर को खींचकर गहराई से निकाला। उसका दहिना पैर घुटने से नीचे पूरी तरह फट गया था। अदंर शिलाखंड में उसका पैर इस बुरी तरह फँसा था कि वह खुद निकल ही नही सकती थी।

कुछ ही क्षण पहले खिला हुआ वह कमलपुष्प अब किसी ने तोड मरोड कर फेंक दिया था। मैं सुन्न था। पर जो भी संवेदना बची खुची थी। वह मुझे सबसे अपना मुँह छिपाने के लिये विवश कर रही थी। बाकी सभी सुन्न थे। लेकिन भोलानाथ ने बडा प्रसंगावधान दिखाया। कौशल किशोर सहाय जिलाधिकारी झाँसी का नाम और अपना कार्ड भोलानाथ सहाय आकाशवाणी समाचार वाचक दिखाकर और जाने कितनी मुठ्ठियाँ गर्म कर बात को संभाल लिया। गाँववालोंने भी हमसे सहानुभुति रखते हुए मदत की इसी कारण अगले कई गंभीर प्रश्नोंसे हम बच पाये।

मैंने पूछा अमिता के शरीर का क्या करें। विवश स्वर में नायरने कहा अमिता कुर्ला के किसी होस्टेल में रहती थी। उसपर जबर्दस्ती करने का प्रयास करने वाले किसी रिश्तेदार के चंगुलसे भागकर उसने होस्टल का आसरा लिया था। तुम्हें भी तो उसने कुछ नही बताया था। अमिता कदम, उम्र तेईस बरस। बस इतना ही। तुम्हें कुछ और जानकारी हो तो कहो।

नही, किसीको कोई जानकारी नही थी। वर्तमान को पूरी जीवन्तता से जीनेवाली अमिता के भूतकालकी बाबत जानने की कोशिश हममें से किसीने नही की थी।

आखिर वहाँ की लोकरीति के अनुरूप हमने अमिता का शरीर फिरसे बेतवा के हवाले कर दिया। प्राचीन काल से जाने कितने शरीरों की खा जाने वाली उस वेत्रवती-- बेतवा नदी को भी मानो उसके शरीर की भूख थी.......


अब भोलानाथ यहाँ नही रहता। वह लखनऊ चला गया है। नायर, प्रभुदास कभी आये तो आये। या फिर मैं ही जाकर उनसे मिल आता हूँ।

उस दिनसे मेरी वाणी भी अजीब गूँगी हो गई है। मैं बोलना चाहूँ तो शब्द आपस में फँस जाते हैं। गले से केवल आकार निकलता है, कभी सस्वर तो कभी स्वरहीन। इसीसे मैंने बोलना छोड दिया है। और फिर मैं बोलकर भी क्या करूँ। मैं जब कहता हूँ कि अमिता यहाँ आती है तो कोई मेरी बात नही मानता।

ओरछा में पत्थर से बना घाव बाद में काफी फैल गया था। ऑपरेशन करना पडा था। फिर तीन चार महीने अस्पताल। लोग यही मानते हैं कि इन सब बातों का मेरे दिमाग पर असर हुआ है। मैं अब इन्हें समझने लगा हूँ। अस्पताल से घर आया तो भोला प्रभु नायर और जयंती की नजरें बडी अजीब हो गई थी। दया से भरी हुई और अमिता के अस्तित्व को नकारने वाली। फिर मैंने सबको जाने के लिये कह दिया। इसका मुझे कोई पछतावा नही। मैं अपने सारे काम ठीक से कर लेता हूँ और चित्रकारी भी। क्या यही साबित नही करता कि मैं नॉर्मल हूँ।

हाँ, अमिता वापस कैसे आई यह मै नही कह सकता। हो सकता है कि जब हमने उसके शरीर को पानी में बहाया तो वह होश में आई हो। हमे उसे बहा देने की जल्दबाजी नही करनी चाहिये थी। अमिता भी यही कहती है। इसी लिये अब मैने सबसे नाता तोड दिया है।यह चित्र बनाने में लगा रहता हूँ बस। और क्या करूँ? कोई एक कॅसेट लगा देता हूँ और यहाँ आकर बैठ जाता हूँ। कॅसेट से अलग अलग सूर निकल कर बहते रहते हैं। सिलसिलेवार तो आज तक मैने कोई काम किया ही नही। कभी नूरजहाँ की जवाँ है मुहब्बत के बाद अमीरखान साहब का मारवा बजता है। उसके बाद बिथोवेन की सिंफनी। बीच ही मे कभी भोलानाथ का कविता पाठ और शेक्सपीयर। या अमिता का बांगला में शक्ती चट्टोपाध्याय की कविता गाना जो मैंने उसे सिखाया था। आवाजों का एक कोलाज सा मेरे चारों ओर बस जाता है।

हॉस्पिटल से आने के बाद से अब तक मैं उन आवाजों को अनुमान से ही समझता था। लेकिन अब इधर वे आवाजें कुछ स्पष्ट होने लगी हैं। और अचानक मैं देख रहा हूँ कि यह चित्र भी पूरा हो गया है। मैं आश्चर्य और विस्मय से इसे देख रहा हूँ। इसे समझ रहा हूँ। चित्र में पानी है जो खून के धब्बों की तरह जम गया है। उस पार के किनारे की झाडियाँ सहम कर पीछे सरकती हुई आपस में गुँथ गई हैं। पानी से बाहर झाँकते हुए शिलाखण्डों पर टकराकर राज घराने के समाधी मंदिरों के प्रतिबिम्ब चूर चूर होकर टुकडों टुकडों में पानी पर फैल गये हैं। आसमान से प्रकाश की रेखा किसी भाले की तरह पानी को चीरती हुई अंदर तक धँस गई है। इस किनारे पर कुछ मानवी आकृतियों के धब्बे बने हैं और पानी के बीचोंबीच तोड मरोड कर एक गुलाबी गोलाकार रख्खा हुआ हैं। लेकिन पानी का थरथराना चित्र में नही है। या फिर प्रतिबिम्ब के टुकडों का भयसे काँप जाना भी नही हैं। ये बाते चित्र की पकड में नही आती।

चित्र को देखते देखते फिर मेरे कानों में बेतवा के किनारे की नीरवता गूँजने लगी। उसीपर कॅसेट से निकली भोलानाथ की आवाज तरलता से जा बैठी। वह शेक्सपीयर पढ रहा था। हॅम्लेट की पंक्तियॉ सुना रहा था। ऑफेलिया पानी में डूब कर कैसे मरी इसे गर्टयूड के माध्यम से कह रहा था।

There on the pendent boughs
her coronet weeds
chambering to hang an
envious silver broke

When down her weedy trophies
and herself
fell in the weeping brook

Her clothes spread wide
till her garments
heavy with their drink

pulled the poor wretch
from her melodious lay
To muddy death.....

पीछे अमिता की चीख सुनाई देती है। 'बस्स। बंद करो कॅसेट। और नही सुन सकती मैं--।' यह अमिता की आवाज उस कॅसेट से नही निकली इतना ही मैं कह सकता हूँ।
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