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Wednesday, August 15, 2007

चित्र -- मराठी कथा से अनुवाद भाग 3/4

चित्र -- मराठी कथा से अनुवाद भाग 3/4

मूल मराठी कथा -- परशुराम देशपांडे
हिन्दी अनुवाद -- लीना मेहेंदले

॥॥॥॥॥॥

वह आठ दस दिन नही आई तो मेरा मन हर पल उसी की याद में उलझा रहा। यदि आदत का कठोर अंकुश न होता तो मेरा संयम कबका टूट कर मैं उसके पास जा पहुँचता। भोलानाथ से मेरी व्याकुलता कैसे छिपी रहती? मैं जब सब कुछ सुना चुका तो एक लम्बी हुंकार भरते हुंए वह सोफे पर आराम से टिक गया और बुढऊ अंदाज में कहने लगा -- वाकई आशुतोष, हम सब कई दिनों से यही बातें कर रहे हैं कि अब तुम दोनों को शादी कर लेनी चाहिये।

लेकिन नही। मेरा मन अब भी घबरा रहा था ऐसे किसी निर्णयसे। मैं एक उजडी इमारत के टूटे हुए शिलाखंड की तरह था। मेरे पिता भरा पूरा संसार छोडकर गिरी कंदराओं में भटकने के लिये निकल गये थे। वही मनमौजी खून मेरी भी रगोंमे दौड रहा था। उस खून की प्रवृत्त्िा से मैं डरता था जिसने इतनी आसानी से जिम्मेदारी ठुकरा दी थी। उन्हें पत्त्िायों की अनुगूँज में मंत्रों का घोष सुनाई देता तो मुझे भी तो रंगों के इशारे दिखते। हावडा स्टेशन का वो आसिस्टंट स्टेशन मास्टर गंगाप्रसाद मुखर्जी कभी तो अपने ऑफिस लौट आयगा इस उम्मीद से सुबह शाम वहाँ चक्कर लगाने वाली और फिर हावडा स्टेशन की भीड में खो जाने वाली मेरी माँ। मैं डरता हूँ कि कभी अमिता का हाल भी माँ की तरह न हो जाय।

मेरे और अमिता के बीच के तनाव ने मित्रों को भी घेर लिया था। प्रभुदास, भोलानाथ, नायर आते और हम यूँ ही चुप बैठे रहते। देर तक। फिर वे बिना संभाषण के ही विदा हो जाते। एक दिन भोलानाथ अचानक एक प्रस्ताव ले आया। उसे बुंदेलखंड के लोकसाहित्य पर प्रबंध लिखने के लिये शोधवृत्त्िा मिली थी। वह झांसी, ओरछा, टिकमगढ और महोबा जाकर यह काम करने वाला था। लेकिन पहले एक क्विक्‌ दौरा जरूरी था। भोलानाथ की आयडिया थी कि हम चारों इस छोटी पिकनिक पर चलें। 'देख, प्रभुदास और नायर तैयार हैं और यदि तुम्हें मंजूर हो तो अमिता ने भी हाँ कर दी है।' 'अमिता का जाना न जाना मेरे जाने से क्यों जुडा है?' 'यह खुद जाकर उसीसे पूछ ले। यार, तुम तीस वर्ष की उमर बीत जाने पर भी बच्चों की तरह बिहेव कर रहे हो। एक ओर ये रूठना, दूसरी ओर जनम जनम का साथ निभाने की बात करना।'

मैंने चेहरा गंभीर बनाये रखा लेकिन मेरा मन पुलकित हो उठा था। इन आठ दस दिनों में ही मैं जान गया था कि मैं अमिता के बगैर नही जी सकता । वह आई थी एक सुगन्धित झोंके की तरह लेकिन आज तूफानी हवा बनकर मेरे मन को उलीच रही थी। मेरे सपनों पर अब उसका कब्जा था। वह मेरे चित्रों की प्रेरणा थी। या यूँ कहूँ कि पंद्रह वर्ष पहले यहाँ आये इस बंगाली लडके को अपनी छाँव देने वाली मुंबईने फिर एक बार अमिता के रूप में मुझे बाँहों में समा लिया था। अमिता के ही कारण मेरा जलाशय जैसा मन शांत हो गया था और उसकी सतह पर आकाश की नीलिमा बिखर गई थी। उस नीलिमाने मेरी चित्रशैली को बदल दिया। मेरे पहले चित्रों के काले बादलों जैसे तैरते गहरे रंग, कोई खंडित शिल्पप्रतिमा, कही निष्पर्ण पत्तों से झांकती व्याकुलता, सब कहीं उड गये थे। मेरे चित्रों में अब कॅक्टस की बजाय सुगंधी फूल खिलने लगे थे। काली घनी रेषाएँ पानी में घुलकर धुंधली हो जा रही थीं। जब मेरे मन का मधुमास सुआपंखी और गुलाबी रंगो मे प्रगट होने के लिये अकुलाने लगा तो मैने ऋतुवसंत नामक एक चित्रमालिका बना डाली थी। मेरे पहले गूढ चित्रों को शब्दार्थ देकर कई पन्ने रंगने वाले समीक्षकों की लेखनी इन सीधे सरल चित्रों पर लिखते हुए कन्फ्यूज होकर थम गई। तब मैने और अमिता ने कितना एन्जॉय किया था।

भोलानाथ की बातोसे मैं भीतर तक पारदर्शी हो गया। यह प्रेम ही तो था। मेरे मुरझाये जीवन वृक्ष पर अमिता फिर से नए फूल उगा देगी । रेगिस्तानी बंजर में पडा मेरा चैतन्यबीज इसी अमिता नामक बौछार की प्रतिक्षा में था। अब मुझे चाहिये अमिता का सामिप्य -- सर्वदा के लिये। हमारे बीच दुराव की कल्पना करना ही कितनी मूर्खता थी? मिलनसंधी के इस प्रस्ताव से मैं झूम उठा। दूसरे ही दिन अमिता उसी पुराने हकसे मेरे घर आई। जाने की तैयारी, सामान की पॅकिंग, सारा काम उसीने संभाल लिया। बाकी प्लानिंग सबने पहले ही कर रखी थी। मैं, नायर, उसकी पत्नी जयंती, अमिता, प्रभुदास और भोलानाथ सफर के लिये चल पडे।

मुबंई से पहला पडाव झाँसी। दो तीन घंटो मे ही वह छोटासा शहर हमने उलट पुलट कर देख लिया। तिपहिया सिक्स सीटर टमटंम पर धीमी गति में घूमते हुए स्कूली बच्चों की तरह सारे पोस्टर हम जोर से पढते चल रहे थे। 'कौशल किशोर सहाय, जिलाधिकारी' -- एक तख्ती को जोर से पढकर मैंने भोलानाथ से पूछा - बी एन, कही यह केके तेरे काका तो नही? इस पर सब हँस पडते इससे पहले गंभीर चेहरा बनाकर भोलानाथ बोला, 'हाँ रे हाँ, ये मेरे केके चाचा ही हैं लेकिन धीरे बोलना वरना वे दौडकर बाहर आ जाएगे।' इस पर हँसी की फौव्वारा छूटा। रात सेंट्रल होटल के उमस भरे कमरे में भोलानाथ की धाराप्रवाह वाणीमें बुदेलखंड का इतिहास सुनते सुंनते जो आँख लगी तो सुबह जल्दी उठो की धूम मच गई। उसी तंद्रा में हमने ओरछा के लिये कूच किया।

ऐसे रूखे प्रदेश में मै पहली बार आ रहा था। कोलकाता और मुंबई दोनो महानगरी में समुद्र का खारापन लिये हवा के नम झोंकों की मुझे आदत सी हो गई थी। वह बुंदेलखंडी शुष्क और तपिश भरी हवा मुझे रास नही आई।
आधे घंटेमें हम ओरछा पहुँच गये। जैसे कोई पुरानी नौका पानी में डूबकर डूबकर समुद्र की तलछट में सदियों तक पडी रहे कुछ ऐसा ही लगा। वर्तमान के किनारे से दूर अपने भूतकाल के जीर्ण वस्त्र ओढे बैठे सकुचाए बूढे की तरह। कुछेक आधुनिक टाइपके घर और वहाँ के आदमी उस पुराने वस्त्र पर टँके पैबन्द की तरह लग रहे थे।

कहने को तो यह पर्यटन क्षेत्र था लेकिन पहली नजर मे लगा कि वहाँ पर्यटकों के लिये कोई आकर्षण नही। एक दुर्ग में बना महल, सामने श्रीराम और श्री चतुर्भुज नारायण के मंदिर। उनके पीछे उजडी हुई बगिया और जहाँ तहाँ बिखरे हुए राजधानी के अवशेष। ओरछा का पहला दर्शन उत्साह बढाने वाला नही था। लेकिन धीरे धीरे हमारी नजरोंको उसकी खूबियॉ दीखने लगीं। पुराने राजमहल का एक हिस्सा अभी भी सजा सॅवरा था। वीरसिंहजू देव ने अपने शरणागत मित्र जहाँगीर के लिये सत्रहवीं सदिमें बनवाया जहाँगीर महल अब एक होटेल बन गया था।

छोटे छोटे कमरों वाले रानी महल के गालियारो मे हलकी उष्मा लिये हवा के झोंके अल्लड बालिकाओं की तरह अठखेलियॉ कर रहे थे। भोलानाथ हमें बता रहा था-- ओरछा का राजा था कृष्णभक्त और रानी के आराध्य श्रीराम। रानी अयोध्यासे श्रीराम की मूर्तिको छोटे बच्चे की तरह अपने बाजुओं पर उठाकर यहॉ तक आ गई। प्राणप्रतिष्ठा होने तक उसे जमीन पर नही रखना था। लेकिन थकी हारी रानी ने किसी अनजान क्षणमें अनायास मूर्ति को जमीन पर रख्खा तो वह वहीं पर धँस गई। फिर उसी के चारों ओर मंदिर उठवाया गया। यही था वह मंदिर।

अपने देशके करोडों देवी देवताओंकी अनगिनत दंतकथाओं की तरह यह कथा भी लगी। लेकिन भोलानाथ ने दिखाया-- यह घटना वहाँ के एक शिलालेख पर खुदी हुई थी।

प्रभुदास और नायर अपने अपने कॅमेरेमें धडाधड तस्वीरें उतार रहे थे। अमिता ने शौकिया घागरा चोली पहन रखी थी जे उस परिवेशसे मेल खा रही थी। दसियों बच्चे अपने मैले कुचैले कपडे, रूखे बाल और उत्सुकता भरी आँखें लिये हमारे आस पास मंडरा रहे थे। भोलानाथ की हिदी कॉमेंट्र जयंती को कोई खास समझ नही आ रही थी। वह अपनी खोई खोई आँखो से इधर उधर देख रही थी। हमें घेर कर खडे बच्चों के पीछे से घूँघट काढी महिलाएँ उसके साँवले कानों में सजे हीरे के कर्णफूलोंकी चमक को आँखों मे समेट रही थीं।

मेरी स्केचबुक भी रेखाचित्रोंसे भरने लगी थी। वहाँ के दो-ढाई सौ भित्ती चित्रों ने मुझपर एक अजीब जादू कर दिया था। बिलकुल अलग एक मर्दाना शैली, जिसकी स्त्र्िायाँ भी वीररस में आवेशित थीं। मैं उस शैली को अपनी रेखाओं में पकडने मे जुट गया। अमिता को दिखाया-- देख, देख, बुदेलखंडी शैली के ये मूँछोंवाले राम और लक्ष्मण मै पहली बार देख रहा हूँ। सुकुमार राम की जगह ये तनी हुई मूँछोवाले राम? अमिता ने हंसते हुए कहा -- तुम्हें अपनी अराफत स्टाईल दाढी पर अभिमान है, इसीलिये तुम्हारी नजर पहले मूँछोपर ही गई। उस धूसर भूतकाल के आवरण ने मुझे अपना बचपन याद दिलाया-- हाँ, हाँ मैं भी स्कूल मे सुभाष बोस और विवेकानन्द के चित्रोंपर पेन्सिल से मूँछें बनाता था।

तभी भोलानाथ ने मुझे बुलाकर एक दरवाजे की ओर इशारा किया। मैने दूरसे ही देखा-- दरवाजे के दोनों ओर आमने सामने डटे हुए दो हथियों के चित्र थे । हाथियों पर कृष्ण विराजमान थे। भोलानाथ ने पुकार कर कहा-- दूर से नही, जरा पास आकर तो देख। यह कोई सीधा सादा कृष्ण का चित्र नही है। यह है रसराज कृष्ण। मैने नजदीक जाकर कौतुहल से देखा तो वाकई चित्र हाथी का नही था, बल्कि एक दूसरे से लिपटी हुई नौ गोपियों के शरीर उस हाथी के आकार में समाये हुये थे। उनके शरीर से हाथी के शरीर का आभास हो रहा था।

भोलांनाथ ने बताया-- ये नौ गोपियाँ हैं नौ रस और उनपर आरूढ हुआ है इसी से यह रसराज कृष्ण है। मैंने मन ही मन अपने उस पूर्वज दार्शनिक चित्रकार को प्रणाम किया।
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