my first blog आणि नवीन लेखन

Sunday, November 01, 2009

लोकसत्ता बुधवार 8 जुलै 2009 मुलाखत

लोकसत्ता बुधवार 8 जुलै 2009 मुलाखत
http://sites.google.com/site/leenameh/loksatta-vachanrang.pdf
चरख्याचे तत्वज्ञान प्रत्यक्षांत आणता येईल कांय --
लोकसत्ता बुधवार 8 जुलै 2009 पुन्हा चरखा

http://sites.google.com/site/leenameh/punha-charkha.pdf

Wednesday, October 14, 2009

महाराष्ट्र में महिला विरोधी अपराध : बलात्कार

महाराष्ट्र में महिला विरोधी अपराध : बलात्कार
लीना मेहेंदले, भाप्रसे
किसी समाज की अच्छाई की माप क्या हो सकती है? यही कि उसके विभिन्न वर्गों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है । इसलिए यह जानना जरूरी है कि किसी भी समाज में गुनहगारी कितनी है, खासकर महिलाओं के प्रति घटने वाले अपराध किस तरह के और कितने हैं । इसमें भी बलात्कार के अपराधों का विश्लेषण अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि औरत जात के विरूद्ध यह सबसे अधिक घृणित अपराध है ।
भारत सरकार के नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो की मारफत यह लेखा-जोखा रखा जाता है कि प्रतिवर्ष देश में कहां-कहां कितने अपराध घट रहे हैं । पिछले तीन वर्षों के आँकड़े बताते हैं कि अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में अधिक अपराध घटते हैं । मसलन १९९८ में देश की जनसंख्या ९७ करोड़ ९ लाख थी जबकि भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दर्ज कराये अपराधों की संख्या थी १७ लाख ८० हजार । अर्थात्‌ प्रति लाख जनसंख्या में १८३ अपराध घटे थे। लेकिन महाराष्ट्र के लिए यही औसत प्रति लाख २०२ था ।
बलात्कार के आंकडें जाँचने पर पता चलता है कि १९९८ में १५०३१ बलात्कार दर्ज हुए जो औसतन प्रति करोड़ १५५ थे, लेकिन महाराष्ट्र के लिए यही औसत १२४ था । अर्थात्‌ देश के अन्य भागों की तुलना में महाराष्ट्र की छवि कुछ अच्छी रही । यहां यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि असली औसत दर १५५ या १२४ के दुगुनी माननी पड़ेगी क्योंकि यह अपराध केवल स्त्र्िायों के विरूद्ध होता है ।
इस संबंध में एक विस्तृत पढ़ाई का संकल्प बनाकर सबसे पहले मैंने पिछले दशक में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों में घटित बलात्कार के अपराधों का ब्योरा लिया । इसके लिए १९९६ की जनसंख्या के आंकड़ों को आधारभूत माना जो कि समूचे महाराष्ट्र के लिए ९.२७ करोड़ थी । जनसंख्या के आंकड़े मैंने जनगणना कार्यालय से प्राप्त किए जबकि जिलावार अपराधों के आंकड़े ब्यूरो से प्राप्त हुए ।
कुल अपराधों का ब्योराः-
सबसे पहले महाराष्ट्र के विभिन्न प्रमंडलों और उनके जिलों में पिछले दस वर्षों में घटित बलात्कार के अपराधों का ब्योरा लें । प्रत्येक प्रमंडल के लिए वहां के डिवि.जनल कमिशनर तथा डी.आई.जी. पुलिस की जिम्मेदारी होती है, इसी प्रकार प्रत्येक जिले में वहां के कलेक्टर तथा एस.पी. की जिम्मेदारी होती है कि वे अपराधों की रोकथाम करें । अतएव इस ब्योरे से उम्मीद की जा सकती है कि संबंधित जिले और प्रमंडल के अधिकारी अपने-अपने आंकड़ों से कुछ सीख लेंगे और अपराधों को कम करने का प्रयत्न करेंगे । साथ ही यह आशा भी की जा सकती है कि उक्त जिले या प्रमंडल के विधायक, लोकसभा सदस्य और सामाजिक संस्थाएं भी अपने-अपने कार्यक्षेत्र में इन अपराधों के विरूद्ध आवाज उठायेंगे या नीति-निर्धारण के लिए उपाय सुझायेंगे ।
इस ब्योरे से कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं जैसेः-
• महाराष्ट्र में प्रति वर्ष हजार से अधिक बलात्कार होते हैं । १९९० से १९९९ तक कुल ११६७५, अर्थात्‌ प्रतिवर्ष औसतन ११६८ बलात्कार हुए ।
(देखें चित्र 1 का ग्राफ)
• १९९६ में बलात्कार की घटनाओं में अचानक वृद्धि हुई और प्रायः हर जिले में हुई । ३२ में से केवल पांच जिले रत्नागिरी, कोल्हापुर, सांगली, नांदेड और उस्मानाबाद ही इससे अछूते रहे । रत्नागिरी में १९९९ में एकाएक बढ़ोतरी देखी जा सकती है । जबकि नांदेड, बीड और उस्मानाबाद में भी इसी दौरान अपराधों की संख्या में दुगुनी वृद्धि हुई । समाजशास्त्र्िायों के लिए यह एक सोच का विषय है कि एक साथ हर तरफ बलात्कार की घटनाएं क्योंकर बढ़ी ?
• १९९५ और १९९६ में अधिकतम बलात्कार दर्ज हुए जो १९९७ में कम होकर फिर धीरे-धीरे बढ़कर १९९९ में वापस १९९६ के स्तर पर पहुंच गये । इसकी कोई वजह होगी ।
• मन्तव्य है कि यही समय था जब टी.वी. पर विभिन्न चैनलों का प्रसारण जोर-शोर से आरंभ हुआ । इस विषय में विशेष अध्ययन आवश्यक है कि इन प्रसारणों का समाज में बढ़ते बलात्कार के अपराधों से किस तरह का संबंध या प्रभाव है । दूसरी विचारणीय बात है कि १९९५ में विधानसभा चुनाव तथा १९९६ में लोकसभा चुनाव हुए और महाराष्ट्र में सत्ता पलट हुआ ।
• दस वर्षों में कुल घटित अपराधों में से आधे अपराध केवल सात जिलों में हुए हैं - जो हैं मुंबई, नागपुर, ठाणे, अमरावती, पुणे, भंडारा और यवतमाला अतएवं यहां की पुलिस को अधिक मेहनत से इन अपराधों के लिए न्याय दिलाने की जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी ।

गुनाह की दर एवं आदिवासी क्षेत्र :-
गुनाह की संख्या के साथ-साथ गुनाह की दर देखना भी आवश्यक है । संख्या का महत्व पुलिस की दृष्टि से है क्योंकि इन्हें हर गुनाह की जांच करनी है और उसे अंतिम उद्देश्य तक पहुंचाना है, जबकि सामाजिक संस्थाओं या महाविद्यालयीन अध्ययन के लिए गुनाह की दर का महत्व अधिक है क्योंकि इससे सामाजिक ढांचे के सुधार के विकल्प समझ में आते हैं ।
• अन्य जिलों की तुलना में नागपूर तथा अमरावती प्रमंडल के जिलों-यथा नागपूूर, अमरावती, वर्धा, गडचिरोली, भंडारा, चंद्रपूर और यवतमाल में बलात्कार की दर अत्यधिक है । यह सारे ही आदिवासी बहुल जिले हैं । ठाणे जिला भी इसी श्रेणी में है । लेकिन महाराष्ट्र के अन्य आदिवासी बहुल जिले जैसे पुणे, नाशिक, धुले और रायगड़ में यह ट्रेंड नहीं पाया गया । यहां भी विचारणीय है कि धुले और नासिक जिले में आदिवासी नागरिकों के पास जमीन है जबकि नागपुर एवं अमरावती में वे प्रायः भूमिहीन हैं ।
• एक चित्र यह है कि यद्यपि महाराष्ट्र में घट रहे कुल अपराधों की दर देशभर में घट रहे अपराधों की दर से अधिक है, फिर भी बलात्कार के मामले में महाराष्ट्र की दर देश की दर से कम है । उसी प्रकार महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों का चित्र क्या है ? मैंने दो नक्शों पर कुल अपराधों की दर तथा बलात्कार की दर की तुलना की । यह देखा गया कि रत्नागिरी, कोल्हापुर, सांगली, नांदेड, उस्मानाबाद, रायगड़ और सिंधुदुर्ग में दोनों प्रकार के अपराध की दर कम है जबकि नागपुर, अमरावती, ठाणे, पुणे और यवतमाल में दोनों प्रकार के अपराधों की दर अधिक है ।
• गडचिरोली जैसे आदिवासी जिले में इतर अपराध कम लेकिन बलात्कार काफी अधिक हैं जबकि अकोला जैसे बिगर आदिवासी जिले में बलात्कार की दर कम परंतु अन्य अपराधों की दर अधिक है । यह और एक कारण है कि बलात्कार की शिकार महिलाएं कौन हैं, इसका भी ब्योरा लेना आवश्यक है । भले ही राजधानी मुंबई या दिल्ली के स्तर पर यह संभव न हो, लेकिन कम से कम उक्त जिले के जिलाधिकारी के स्तर पर यह ब्योरा आवश्यक है ।
शहरीकरण और बलात्कारः-
• पिछले पचास वर्षों में देश के अन्य प्रांतों की तुलना में महाराष्ट्र का तेजी से शहरीकरण हुआ है । यहां करीब चालीस प्रतिशत जनसंख्या शहरों में रहती है । ब्यूरो के पास शहरों के लिए अलग से उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि मुंबई, नई मुंबई, पुणे, ठाणे, नाशिक, नागपुर, अमरावती, औरंगाबाद और सोलापुर जो कि महानगर माने जाते हैं वहां कुल २७८६ बलात्कार घटे जो कुल अपराधों का पच्चीस प्रतिशत है । लेकिन ऐसा नहीं कि हर शहरी इलाका ग्रामीण इलाके की अपेक्षा अधिक सुरक्षित हो ।
• पुणे, सोलापूर और औरंगाबाद जिले में शहरी जनसंख्या की अपेक्षा शहरों में घटने वाले बलात्कार काफी अधिक हैं जबकि ठाणे, नाशिक, अमरावती और नागपुर जैसे चारों आदिवासी बहुल जिलों में शहरी हिस्सों में बलात्कार की धटना कम हैं ।
• शहरी और ग्रामीण दरों तथा इन शहरों के पुरूष और महिला वर्ग में साक्षरता के प्रतिशत की तुलना करने पर देखा गया कि इन सभी शहरों में महिला साक्षरता का प्रतिशत काफी अच्छा माना जा सकता है । अतएव यह मानना पड़ेगा कि बलात्कार के अपराध की शिकार महिलाएं अपनी अशिक्षा के कारण से शिकार नहीं हुई हैं । शायद शहरों का तनावग्रस्त माहौल, जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि और समुचित पुलिस फोर्स का न होना इत्यादि कारण हो सकते हैं ।
साक्षरता विचार :-
• शिक्षा और साक्षरता का विचार करें तो एक अजीब परिस्थिति दिखाई पड़ती है । मराठवाड़ा प्रमंडल के औरंगाबाद, जालना, परभणी, नांदेड, बीड जिलों में स्त्री शिक्षा का प्रतिशत सब से कम है, इसके विपरीत अमरावती और नागपूर प्रमंडल के सभी जिलों में स्त्री शिक्षा का प्रतिशत अधिक है । फिर भी बलात्कार की दर मराठवाड़ा प्रमंडल में सबसे कम और नागपूर तथा अमरावती प्रमंडलों में सबसे अधिक है ।
इस सारे विवेचन से जो प्रमुख निष्कर्ष गिनाये जा सकते हैं:-
1. महाराष्ट्र प्रशासन को नागपूर तथा अमरावती प्रमंडलों में बलात्कार के अपराधों की छानबीन तथा रोकथाम के लिए अधिक ध्यान देना होगा । इसके लिए यदि समुचित मात्रा में पुलिस फोर्स उपलब्ध नहीं है तो उपलब्ध कराना एवं उसकी कार्यक्षमता बढ़ाना आवश्यक है ।
2. बलात्कार की शिकार महिलाओं के बाबत अधिक गहराई से अध्ययन होना आवश्यक है, खासकर यह कि इसमें आदिवासी स्त्र्िायों का प्रतिशत कितना है और आरोपी व्यक्ति किस श्रेणी अथवा व्यवसाय से संबंधित हैं ।
3. एक अन्य अध्ययन में मैंने पाया है (मेहेंदले २००१) कि अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में अपराधी पर अपराध साबित होने की दर कम है । महाराष्ट्र में यह बात केवल बलात्कार के लिए नहीं बल्कि सभी तरह के अपराधों पर लागू है । इस बात का भी अध्ययन विधि महाविद्यालयों द्वारा करवाना आवश्यक है ।
4. रत्नागिरी, नांदेड, उस्मानाबाद जैसे कम अपराध वाले जिलों में १९९ में अचानक बलात्कार में वृद्धि क्यों हुई ? अन्य सभी जिलों में १९९६ में यह वृद्धि क्यों हुई, इसकी जांच होनी आवश्यक है ।
उपरोक्त तमाम विश्लेषण के बावजूद यह मानना पड़ेगा कि महाराष्ट्र में पिछले दशक में कुछ ऐसी भी घटनाएं हुई हैं जो महज सांख्यिकी या आंकड़ों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है । इनके लिए एन.सी.आर.बी. के मौजूदा ढर्रे से हटकर एक नये सिरे से रिपोर्टिंग आवश्यक है । यह मामले हैं सुनियोजित बलात्कार कांडों के । जलगांव तथा सातारा जिले में घटित दो कांडों में यह हुआ कि नौकरी का लालच देकर मध्य और निम्न वर्ग की थोड़ा पढ़ी-लिखी औरतों को वासना का शिकार बनाया गया और फिर उनकी विडियों के जरिये उन्हें ब्लैकमेल करके बार-बार उन्हें यौनाचार के शोषण का शिकार बनाया गया । परभणी जिले में अगले दिन की परीक्षा के प्रश्न-पत्र देने का लालच दिखाकर कुछ शिक्षकों ने ही एक विद्यार्थिनी का सामूहिक बलात्कार किया । ऐसे सारे सुनियोजित अपराधों के लिए अधिक प्रभावी जांच-पड़ताल और अधिक कड़ी शिक्षा अत्यावश्यक है । लेकिन यह तभी होगा जब इसकी रिपोर्टिंग अधिक गंभीरता से दर्ज कराई जाए ।
एक बार ग्रामीण महिलाओं के एक कार्यक्रम में मैं इन निष्कर्षों की चर्चा कर रही थी कि एक प्रौढ़ महिला ने मुझे ग्रामीण जीवन की एक वास्तविकता से परिचय कराया । उसने कहा कि महिलाओं से बचपन से यही सुनना पड़ता है कि उसकी जिंदगी तो चूल्हे में है । गाँव की लड़कियां भी देखती हैं कि उनके अगल-बगल की तमाम प्रौढ़ महिलाएं केवल रसोईघर में मेहनत का जीवन जीती हैं - चाहे वह माँ हो या सास हो या बड़ी बहन हो या भाभी हो । फिर लड़कियाँ सोचती हैं कि यदि वे पढ़कर कोई नौकरी ढूँढ लेती हैं तो इस रसोईघर की कैद से उनका छुटकारा हो सकता है । इसीलिए वे उन तमाम लोगों की शिकार बन जाती हैं जो उन्हें थोड़ा बहुत फुसला सकें । यदि जलगांव और सतारा जैसे कांड रोकने हैं तो स्त्र्िायों के लिए व्यवसाय शिक्षा का प्रबंध आवश्यक है । उस अनपढ़ ग्रामीण किन्तु भुक्तभोगी औरत ने मुझे वह वास्तविकता बताई जो मेरे विचारों से कहीं छूट गई थी ।
लेकिन इससे भी भयावह वह घटना है जो पिछले वर्ष अहमदनगर जिले के कोठेवाडी गांव में घटी । सारणी से देखा जा सकता है कि सामान्यतः अहमदनगर में बलात्कार के मामले कम थे । फिर भी इतने बड़े पैमाने पर इतनी जघन्यता के साथ महाराष्ट्र में कभी अपराध नहीं हुए थे जैसे कोठेवाडी में हुआ । इस घटना में किसी भी पारंपरिक पद्धति से अपराध का विश्लेषण नहीं किया जा सकता है । इस घटना में गांव में सामूहिक डकैती करने के लिए गए युवक डकैती के पश्चात्‌ गांव में अकेली रहने वाली महिलाओं पर झुंड में टूट पड़े और सामूहिक बलात्कार किया । इससे पहले उन्होंने अलावा जलाया, खाया, शराब पी और गांव वालों को रस्सियों से बांधकर मारा-पीटा भी । यह पूरी घटना एक संकेत है कि आने वाले दिनों में सिनेमा तथा अन्य प्रसार माध्यमों में दिखाये जाने वाली घटनाएं समाज के अपराधों को कितना भयावह रूप दे सकती है । इस घटना से यह भी आभास मिलता है कि महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके में बढ़ती हुई बेकारी और निराशा समाज को कहां ले जा रही है । मुंबई जैसे कार्यक्षम पुलिस के दबाव में यह बेकारी आर.डी.एक्स, गैंगवार और शार्प शूटर्स के रूप में प्रगट होती हैं लेकिन ग्रामीण इलाके में यह अवश्यमेव स्त्री-विरोधी अपराधों के रूप में प्रगट होगी जो कि महिलाओं के लिए चिंता का विषय है । यह जरूरी है कि कोठेवाड़ी की घटना से कुछ सीख लेकर हम अपनी रोजगार की नीतियों को अधिक प्रभावी बनायें ।
........

Sunday, October 11, 2009

defining a good dharmik hindu

Mr Asthana asthana1@yahoo.com asked the following for his book
"I want to collect the beliefs of some followers of the Sanatan Dharm. I would be grateful if you can kindly grant me some time and email me the answer to the following question. This may be a very short answer - perhaps six to eight short paragraphs or 200 words and may take not more than 20 minutes or so of your time. The question is this:
What, if anything, does belonging to your faith mean to you personally - not in terms of dogma, ritual or Vedic knowledge, but in terms of values and ideas which you implement in your day to day life and which have moulded your conduct?"
--------------------------------------------------------------------------
My reply
The question is about SANATAN DHARMA.
This word has now got a different meaning as some people have formed a group to spread SANATAN DHARMA –a word to which they attach a certain specific meaning and rituals. So I will instead use the word Dharma. Also what I feel about Dharma begins with what I was taught as a child and which later got refined through my own thinking. So I may refer to some traditions and rituals – but my concept of Dharma is not always based on them.
Dharma is defined as धारयति सः धर्मः – something that gives strength to hold yourself together – be it you as self or you as a society or a nation or the world or the Universe. The old religious prescription was to be धार्मिक – less destructive and more constructive, and depending on your target group you were asked to practice rules and harness various qualities which increase your contribution for the धारणा of the society.
The first such qualification is being truthful – ऋग्वेद says -- सत्यमेव जयते नानृतम् । From which also flows the concept of धन for which the prescription is – "you shall not take or crave for what has not been earned by you." ईशावास्योपनिषद् says – मा गृधः कस्यस्विद्धनम् –।
(pl see this u-tube – http://www.youtube.com/watch?v=mGxGzgHrWvc and
http://www.youtube.com/watch?v=sGBDSxVd-8s )
For the development of society you need harmony so ऋग्वेद says –
सं गच्छध्वं सं वदध्वं, सं वो मनांसि जानताम् । -- you folks must nurture the habit of walking together, talking together and consult each other with your entire heart, and thus you will achieve PROGRESS.
And Geeta talks about कर्मकुशलता, समदर्शिता, स्थितप्रज्ञता and वाङ्मय-तप – (अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्)
As a Hindu, when we look at a Muslim or a Christian or a Jew, the first thing that impresses us is that they follow 1 leader. More than the perception of 1 God, this faith in 1 leader, 1 book and 1 (common) prayer hall with a common prayer offering is the first and foremost characteristic of these religions. What a force and grandeur it is to have many people in 1 synchronized action! Even when I am witnessing the vedic recital by 10-12 students as their morning lessons, or a big orchestra playing music in harmony, I am tremendously impressed.
If we see the core teaching of either Zoroaster, or Christ or Paigambar, they all teach of truthfulness and not stealing, harmony and not hurting. It is this one leader who preaches and others find easy to follow. Even if they don’t, they know that being religious means to attend those common prayers and follow what the Leader said.
In Hinduism there are lot of saviors and saints and they are all given a high platform – even of God, and yet there is no Hindu who does not understand the concept of एकं ब्रह्मः। But just as the childlike demand by Arjun, we all need to SEE the विभूति –to enrich our faith in Him and there is no unintelligence in it. विभूति brings श्रद्धा which is a great force indeed.

This is my perception of Hinduism. For judging myself as a hindu, I will ask -- Am I truthful, Do I don’t steal (अचौर्य and अपरिग्रह) Do I don’t hurt, Do I make efforts to foster Harmony in society? And when I see the icons of faith, Do I fold my hands in gratitude that these icons have been a source of creating a binding force through belief (श्रद्धा)?

IF I DO, THEN TO THAT EXTENT, I AM A GOOD HINDU.
--------------------------------------------------------------
A story goes of a saint poet Narhari Sonar -- an ardent shiv-bhakt, who refused to worship Vitthala of Pandharpur. Once he was asked to come and take measurements and make a gold kamarband for Vitthala - he was told that he cannot refuse his profession but he can be taken blindfolded to Vitthala temple so that he does not have to see the God and pay respect. When blindfolded Narhari touched the statue, he found all the description matched with that of Shankar -- the Jata, the moon-crescent, the snakes, the ganges...
Hurriedly, he removed the cloth from his eyes and found it was Vitthala. So closing his eyes again he felt the statue and again found that his fingers were feeling a shiv-statue. When this repeated some times, he realised the meaning and thereafter wrote beatiful verses as to how both shiv and vishnu were one Brahma. That shows the spirit of Harmony.
-----------------------------

Friday, October 02, 2009

शेतक-यांच्या आत्महत्या रोखण्याकरीता दूरदर्शन मालिका

!! विदर्भातील आत्महत्याग्रस्त जिल्हयातील शेतक-यांच्या आत्महत्या रोखण्याकरीता दूरदर्शन मालिकेद्बारे प्रबोधन करणे - मालिकेची थीम !!
---------------------------------------------------------------------

पार्श्र्वभूमी :

गेल्या दोन ते तीन वर्षामध्ये विदर्भातील बुलढाणा, अकोला, अमरावती, यवतमाळ, वाशिम व वर्धा या जिल्ह्यांमध्ये प्रामुख्याने शेतक-यांच्या आत्महत्या होत असल्याचे दिसून येते. सदरच्या आत्महत्या शेतक-यांमध्ये आलेल्या नैराश्येपोटी होत असल्याचे असून त्यामागे नापिक जमिनी, अवेळी पाऊस, अल्प उत्पन्न तसेच यामुळे वाढलेला कर्जबाजारीपणा इत्यादी कारणे असल्याचे दिसून येते. शेतक-यांची नैराश्यची भावना दूर करण्याच्या उद्देशाने व पूरक जोडधंदा उपलब्ध करुन देण्याच्या उद्देशाने राज्य शासनाने तसेच केंद्र शासनाने विशेष पॅकेज उपलब्ध करुन दिले आहेत. सदर पॅकेज अंतर्गत विविध योजनांचा अंतर्भाव असून शेतक-यांना प्रशिक्षण देणे व त्यातून त्यांची मानसिक स्थितीत सुधारणा घडवून पॅकेज अंतर्गत उपलब्ध असलेल्या योजनांचा फायदा घेणे हा प्रमुख उद्देश सदर प्रशिक्षणांतर्गत आहे. प्रशिक्षणाच्या माध्यमातून शेतक-यांना विदर्भाबाहेर म्हणजेच पश्चिम महाराष्ट्रात सहलीद्बारे नेऊन त्याठिकाणी पशुपालनामध्ये व दुग्ध उत्पादनामध्ये झालेली वाढ व त्याकरीता शेतकरी करीत असलेले आधुनिक उपाययोजना याबाबतची माहिती व प्रात्यक्षिकाद्बारे दाखविणे हा प्रमुख उद्देश आहे.


दूरदर्शन मालिकेसाठी थीम (Concept)

मालिकेचा नायक व नायिका मध्यमवर्गीय शेतकरी कुटुंबातील आहे. एकदा प्रशिक्षणाकरीता शेतक-यांना प्रोत्साहीत करण्याकरीता प्रसिध्दी माध्यमातून जाहिरात दिली जाते. सदर जाहिरातीमध्ये शेतक-यांना आकृष्ट करण्याकरीता महाराष्ट्रातील प्रसिध्द देवस्थान उदा. तुळजापूर, पंढरपूर, कोल्हापूर इत्यादी ठिकाणच्या देवतांचे दर्शन घडवून पशुधन जोपासणेबाबत आधुनिक पध्दतींची माहिती देणेबाबत प्रसिध्दी दिलेली असते. सदर जाहिरात खेडोपाडयात सुध्दा पोहचविण्यात येते. प्राथमिक व माध्यमिक शाळेत शिकणा-या विद्यार्थ्यांनासुध्दा या जाहिरातीबाबत माहिती देण्यात येते. जाहिरातीमधील माहिती प्रथमिक शाळेतील धाकटा भाऊ आपल्या पालकांना देतो. सदरचे कुटुंब कर्जबाजारी असून पती पत्नी व मोठा मुलगा रोजंदारीवरील कामकाज करुन कुटुंबाचा चरितार्थ भागवित असतात. या कुटुंबाकडे दोन ते अडीच एकेर कोरडवाहू शेती असून नैसर्गिक पावसावर अत्यंत अल्प उत्पन्न मिळत असते. तसेच घरातील मुलीचे लग्न गेल्यावर्षी करण्याकरीता स्थानिक सावकराकडून कर्ज घेतलेले आहे. अशा परिस्थितीत कुटुंबातील छोटा मुलगा शाळेमध्ये मिळालेली जाहिरात आई वडिलांच्या हातात देऊन यातील योजनामुळे कुटुंबाचा फायदा होईल असे गुरुजींनी सांगितल्याचे सांगतो. रात्री झोपण्यापूर्वी कुटुंबातील स्त्री पतिस सांगते की, आपण सदर सहलीस जाऊया त्यामुळे काही आर्थिक फायदा झाला नाही तरी देव दर्शन तरी होईल. जन्माला येऊन आतापर्यत दारीद्रयातच खितपत पडलो. कुठल्याही देवाचे दर्शन घेता आलेले नाही. निदान या सहलीच्या निमित्ताने मरण्यापूर्वी ेदेवाचे दर्शन तरी होईल अशा प्रकारची गळ आपल्या पतीला घालते. बराच काळ चर्चा केल्यावर पती पत्नीचा एक विचार होऊन सहलीस जाण्याचे ठरते. दुसरे दिवशी ग्रामपंचायत कार्यालयात जाऊन सदर सहलीस जाण्यासाठी कोणाकडे व कसा अर्ज करावयाचा याबाबत कुटुंब प्रमुख ग्रामसेवक व सरपंच यांचेकडे विचारणा करतो. त्याच दिवशी दुपारी पशुसंवर्धन व दुग्धविकास विभागाचे पंचायत स्तरावरील अधिकारी लाभार्थी निवड करण्याकरीता येणार होते. गावामध्ये सदरची माहिती दवंडीद्बारे व नोटीस बोर्डावर लावण्यात आली होती. सदरची नोटीस ग्रामसेवकांनी त्यांना दाखवली व दुपारी पंचायतीमध्ये येण्यास सांगितले.
ग्रामपंचायतीमध्ये भरुन दिलेल्या अर्जाप्रमाणे सदर कुटुंबातील पती पत्नीची निवड सहलीकरीता केली जाते व त्याप्रमाणे सहलीचा कार्यक्रम कळविण्यात येतो.
शैक्षणिक सहलीमध्ये 30 - 40 लोकांचा सहभाग असून सहलीच्या सुरवातीस त्यांना तुळजापूर येथील भवानी मातेचे दर्शन घडवून पंढरपूर येथे श्री पांडूरंगाचे दर्शनास नेण्यात येईल असे सांगण्यात आले. तुळजापुर येथे मुक्कामात सहलीमधील लाभार्थी चर्चा करताना बर झाल सहलीस आलो. त्या निमित्ताने पांडूरंगाचे दर्शन तरी होईल. अशाप्रकारे चर्चा करतात. दुस-या दिवशी मिरजमार्गे कोल्हापूरकडे जाताना दुग्ध प्रकल्पास व पशुवैद्यकीय सर्व चिकित्सालयास भेट आयोजित करुन दुग्धावर करण्यात येणा-या प्रक्रीया, साठवणूक इत्यादीबाबत प्रात्यक्षिकासह माहिती दिली जाते. तसेच पशुवैद्यकीय सर्व चिकित्सालय येथे जास्त दुध देणा-या गायी, म्हशी त्यांची निगाह, आहार, रोगराईपासून संरक्षण तसेच स्वच्छ दुध निर्मितीबाबत प्रात्यक्षिकासह माहिती देण्यात येते. त्यानंतर वारणा दुध प्रकल्पास भेट देऊन प्रकल्पाची माहिती दिली जाते. गोकुळ, वारणा प्रकल्पांतर्गत वाटप केलेल्या दुभत्या गायी, म्हशींच्या काही शेतक-यांच्या घरी भेटी देऊन खेडे गावातील जनावरांचे गोठे, जनावरांची जोपासणा, आहार, रोगराईपासून संरक्षण, स्वच्छ दुध निर्मिती इत्यादी गोष्टींचे प्रात्यक्षिकासह माहिती दिली जाते.
तीन ते चार ग्रामपंचायतीमध्ये ग्रामस्थ व सहलीस आलेले लाभार्थी यांच्यामध्ये चर्चा घडवून आणली जाते. सदर चर्चेमध्ये पशुपालन, कुक्कुटपालन, शेळीपालन इत्यादीबाबत तांत्रिक अधिकारी समक्ष भाग घेऊन शेतक-यांच्या प्रश्नांचे निराकरण करतात. तसेच वारणा, गोकुळ प्रकल्पातील शेतकरी आपण पशुधनाचे व्यवसायापासून कशी समृध्दी साधली याबाबतची यशोगाथाही सांगतात. पंढरपूर येथे पांडुरंगाचे व कोल्हापूर येथील आंबाबाई मातेचे दर्शन घेऊन लाभार्थिना परत त्यांचे गावी आणण्यात येते. परतीच्या प्रवासात सर्व शेतकरी कुटुंबामध्ये आपण घेतलेल्या देवदर्शनापेक्षा पश्चिम महाराष्ट्रामध्ये शेतीला पूरक धंदा म्हणून मूळ धरलेल्या व वाढलेल्या पशुसंवर्धन कामाची चर्चा होत राहते व गावी परतल्यावर कोणी गायी सांभाळण्याच्या, कोणी शेळया, कोणी म्हशी सांभाळण्याचा उद्योग करुन कुटुंबास आर्थिक हातभार लावणेबाबत चर्चा करतात. गायी परतल्यावर ग्रामपंचायतीकडे सर्व लाभार्थी मिळून अर्ज करतात की, पशुसंवर्धनाच्या योजना आम्हाला घ्यावयाच्या असून त्याबाबत नियोजन सुरु होते. अशा उत्साहाच्या धर्तीवर ही मालिका संपते.

महिला विषयक कार्य व लेखन

महिला विषयक कार्य व लेखन
कार्य़
1984-88 देवदासी आर्थिक पुनर्वसन कार्य़क्रम से 160 महिलाएँ लाभान्वित
1989 से आगे – यशदा में महिला विमर्श पर कई व्याख्यान
1998-2001 राष्ट्रीय महिला आयोग में संयुक्त सचिव
इसी कार्यकाल में स्त्री-समस्या समाधान के लिये दै. राष्ट्रीय सहारा में 23 सलाहकारी लेखोंकी मालिका
2001-02 महिला विरोधी अपराधोंका विशेष अध्ययन
इसी विषय पर मेनस्ट्रीम मासिक में 6 विस्तृत लेख
2002-2005 महिला घुमक्कडी को बढावा देने हेतू पीसीआरए से प्रति वर्ष ऊर्जा-संरक्षण-पखवाडेके निमित्तसे महिलाओंकी टू-व्हीलर रॅली व लेख-स्पर्धा का आयोजन, साथ ही स्पर्धकोंके लिये लेखकोंके साथ एख दिवसीय सेमिनार का आयोजन
लेखोंकी पुस्तक का युगन्धरा शीर्षक से संपादन


हिन्दी लेखन
उठो जागो
सावित्री के साथ ...
इस ढीली दण्डप्रणाली को बदलें
नई सदी की नारी चेतना
महाराष्ट्र में महिला विरोधी अपराध
विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराध
राजस्थान में शिशु लिंगभेद
महिला सक्षमीकरण की दिशा में योजना
कानूनन अन्याय
नागपूर की महिलाओं के पक्ष में
एक औरत का साहस
उन्मुक्त जीवन का फलसफा

मराठी लेखन
त्याची शरम वाटते
बलात्काराला फाशीची शिक्षा हवी
महाराष्ट्रांत बलात्काराचे गुन्हे
त्या "नागपुरी" स्त्रियांसाठी
अंग्रेजी लेखन
1. The Integrated Rural Development Programme For Women In Developing Countries: What More Can Be Done? A Case Study From India
2. Maharastra Profile on Crime Against Women: Rape
3. Dowry deaths in Maharastra
4. Sex differential trends in Infant Mortality
5. Crime Against Women
6. Achievements and challenges Yojana
7. NCW appraisal Yojana
अपूर्ण

शासकीय कर्मचा-यांच्या नियतकालीक बदल्या- मार्गदर्शक तत्वे

शासकीय कर्मचा-यांच्या नियतकालीक बदल्या-
संदर्भांतील मार्गदर्शक तत्वे.


महाराष्ट्र शासन
कृषि,पशुसंवर्धन, दुग्ध व्यसाय विकास व मत्स्यवसाय विभाग
शासन परिपत्रक क्रमांक-संकीर्ण.१००६/६२४५/प्र.क्र.५९/पदुम-१७
मंत्रालय विस्तार, मुंबई-४०००३२.
दिनांक- ३१ ऑक्टोबर, २००६


वाचा- महाराष्ट्र शासकीय कर्मचा-यांच्या बदल्यांचे विनियमन आणि शासकीय कर्तव्ये पार पाडतांना होणा-या विलंबास प्रतिबंध अधिनियम,२००५ या विषयाबाबतची सामान्य प्रशासन विभागाची दि.२५ मे,२००६ ची अधिसूचना.

परिपत्रक

शासकीय कर्मचा-यांच्या नियतकालीक बदल्यासंदर्भांतील शासनाने महाराष्ट्र शासकीय कर्मचा-यांच्या बदल्यांचे विनियमन आणि शासकीय कर्तव्ये पार पाडतांना होणा-या विलंबास प्रतिबंध अधिनियम २००५ दिनांक १ जुलै २००६ पासून अंमलात आणला आहे.

अधिनियमाच्या कलम-३(१) नुसार अधिकारी/कर्मचा-यांच्या नेमणुकीचा कालावधी ३ वर्षाचा आहे. कलम-४(१) नुसार बदलीच्या पदावरील म्हणजे ३ वर्षाचा कालावधी पूर्ण केला असल्याखेरीज सामान्यपणे त्यांची बदली करता येणार नाही.

२. हा अधिनियम शासकीय अधिकारी/कमर्चा-यास जशास तसा लागू राहील. या अधिनियमास कोणतीही बाधा न आणता खालील मार्गदर्शक तत्वांची अंमलबजावणी शक्य तितक्या प्रमाणात पशुसंवर्धन दुग्धव्यवसाय आणि मत्स्यव्यवसाय विभागातंर्गत कार्यरत असलेल्या कमर्चा-यांसाठी करण्यांत येईल.

अ) किती बदल्या ?
ज्या कर्मचा-यांच्या सेवा त्या पदावर ३ वर्षे झाली आहे, त्यांनाच बदलीपात्र समजण्यात येईल.

बदलीपात्र कर्मचा-यांची कार्यरत पदावरील सेवाज्येष्ठता लक्षात घेऊन विभाग निहाय/राज्यस्तरीय यादी करण्यांत यावी. त्यापैकी एकूण पात्र पैकी ३०%कर्मचा-यांचीच बदली करण्यांत यावी.

आ) बदलीची पध्दत
क) सेवानिवृत्तीस २ वर्षे बाकी असतांना कर्मचा-यांच्या विनंतीनुसार बदली करण्यांत यावी. शक्यतो मागितलेल्या ठिकाणचे मुख्यालय किंवा जवळपासच्या भागात बदली करण्यांत यावी. विनंती नसल्यास बदली करु नये.

ख) पती-पत्नी एकत्रिकरणानुसार बदली करावी.

ग) मतीमंद मुलांच्या म्हणजे अंध,अपंग व मुक-बधीर पाल्यांच्या पालकांची बदली त्यांच्या विनंतीप्रमाणे करावी.

घ) प्रत्येक कर्माचा-यांची दहा-दहा वर्षात नक्षलग्रस्त आदिवासी भागात बदली करावी. वर्ग-२,३,४ मधील महिलांची शक्यतो नक्षलग्रस्त भागात बदली करु नये.

ड) आदिवासी/नक्षलग्रस्त भागात २ वर्षे काम केलेल्या कर्मचा-याची त्याच्या पसंतीच्या ठिकाणी बदली करावी.

च) सर्व कर्मचा-यांना एकूण ३० वर्षाच्या सेवेत शक्यतो २ वेळा पसंतीच्या पदावर बदली करावी. साधारणत: पहिल्या २५ वर्षात एकदा व दुस-या २५ वर्षात, याप्रमाणे बदली करावी.

छ) वर्ग-३ च्या कर्मचा-यांकरिता ६ वर्षापर्यंत मुख्यालयाबाहेर बदली करण्यांत येऊ नये. ६ वर्षानंतर मुख्यालयात बदली करावी, परंतु जिल्हा बदलू नये.

ज) वर्ग-३ च्या कर्मचा-याकरिता १० वर्षानंतर त्यांची बदली जिल्हाबाहेर करण्यांत यावी. परंतु महिला कर्मचा-यांच्या बदल्या जिल्हाबाहेर करण्याची गरज नाही.

झ) वर्ग-४ च्या कर्मचा-याबाबत शक्यतो त्यांची जिल्हयाबाहेर बदली करु नये, परंतु विनंती केली असल्यास विचार करावा.

३. वरील मार्गदर्शक तत्वांमध्ये काहीही अंतर्भूत असले तरी-
अ) विनंती असल्यास बदलीचा विचार करावा.

ब) कर्मचा-याविरुध्द विभागीय चैकशी (विभागीय चौकशी नियम-८ खालील) चालू असेल तर प्रशासकीय निर्णय घेऊन बदली करावी.

क) काही कर्मचा-यांची प्रशासकीय सोयासाठी बदली करणे अपरिहार्य असेल तर अशा कर्मचा-यांची बदली करण्यांत यावी.

४. वरील बदल्यासंदर्भातील मार्गदर्शक तत्वे महाराष्ट्र शासनाच्या अधिनियमात कोणतीही बाधा न आणता शक्य तितक्या प्रमाणात अंमलात आणण्यात यावी.

५. राजकीय दबाब आणणारे अधिकारी/कर्मचारी सामान्य प्रशासन विभागाच्या परिपत्रक क्र.सीडीआर.१००६/प्र.क्र.१२/०६/अकरा, मंत्रालय, मुंबई दि.१७.०८.२००६ नुसार कारवाईस पात्र असतील.

६. हे आदेश कृषी व पदुम विभागाअंतर्गत आयुक्त,पशुसंवर्धन, आयुक्त,दुग्धव्यवसाय व आयुक्त,मत्स्यव्यवसाय यांच्या अखत्यारितील वर्ग-३ व वर्ग-४ च्या कर्मचा-यास लागू करण्यांत येत आहेत. याची अंमलबजावणी आयुक्त,पशुसंवर्धन, आयुक्त,दुग्धव्यवसाय व आयुक्त,मत्स्यव्यवसाय यांनी करावी.

महाराष्ट्राचे राज्यपाल यांच्या आदेशानुसार व नांवाने,



सही/-
( सु.ना.पवार )
कार्यासन अधिकारी,महाराष्ट्र शासन,
कृषि,पशुसंवर्धन,दुग्धव्यवसाय विकास व मत्स्यव्यवसाय विभाग

प्रति,-
आयुक्त, पशुसंवर्धन, महाराष्ट्र राज्य, पुणे
सह आयुक्त, पशुसंवर्धन(मुख्यालय), महाराज्य, पुणे
आयुक्त, दुग्धव्यवसाय विकास, महाराष्ट्र राज्य, वरळी, मुंबई
उप आयुक्त(प्रशासन), दुग्धव्यवसाय विकास, महाराष्ट्र राज्य, वरळी, मुंबई
आयुक्त, मत्स्यव्यसाय, महाराष्ट्र राज्य, मुंबई

Thursday, October 01, 2009

राजभाषा हिन्दी से संबंधित जो काम मैंने किए

राजभाषा हिन्दी से संबंधित किए गए काम

जन्मतिथि : 31 जनवरी, 1950
जन्मस्थल : धरणगाँव (महाराष्ट्र)
शिक्षा : एम.एस-सी. (भौतिकी), पटना विश्र्वविद्यालय,
एम.एस-सी. प्रोजेक्ट प्लानिंग, ब्रेडफोर्ड विश्र्वविद्यालय, इंग्लैंड
कार्यक्षेत्र :क) मगध महिला कॉलेज, पटना में एक वर्ष फिजिक्स प्रवक्ता
ख) सन 1974 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश और महाराष्ट्र
में कार्यरत. महाराष्ट्र सरकार में कलेक्टर, कमिशनर पर्दो पर कार्य किया.
ग) सांगली के जिलाधिकारी के पदसे चलाया गया देवदासी आर्थिक पुनर्वास
कार्यक्रम देश-विदेश मे काफी सराहा गया.
घ) ग्राम विकास, उद्योग, कृषि, महसूल व केंद्र शासनमें स्वास्थ, महिला कल्याण व
पेट्रोलियम विभागों मे कार्य किया
ड) संप्रति अतिरिक्त मुख्य सचिव (सामान्य प्रशासन)

पुस्तकें : मराठी भाषामें छः पुस्तके प्रकाशित
हिंदी :--
फिर वर्षा आई बाल-कथा-संग्रह -- 1998
देवदासी : जिल्हा सांगली में कलेक्टर के पदसे देवदासी प्रथा-निर्मूलन बाबत जो कार्य
किया उसकी कहानी --1999
आनन्दलोक: ज्ञानपीठ विजेता मराठी कवि कुसुमाग्रज की 108 कविताओं
का हिन्दी अनुवाद -- 2003
सुवर्ण पंछी : पशु-पक्षियों के रोचक संदर्भ --2001
हमारा दोस्त टोटो : पशु प्रेम पर आधारित कथा --2001
शीतला माता : चेचक की रोकथाम कें लिये सतहरवी/अठाहरवी सदीमे
भारत में प्रचलित वॅक्सिनेशन के कार्यक्रम बाबत--2001
एक था फेंगाड्या : डॉ.गद्रे के मराठी उपन्यास का अनुवाद: भारतीय ज्ञानपीठ
व्दारा प्रकाशित--2006
मन ना जाने मन को : विभिन्न भारतीय भाषाओ से हिन्दी मे अनुवादित
कथासंग्रह--2005
जनता की राय : विभिन्न अखबारो मे प्रकाशित लेखों का संग्रह
है कोई वकील लोकतंत्रका : विभिन्न अखबारो मे प्रकाशित लेखों का संग्रह
मेरी प्रांतसाहबी : विभिन्न अखबारो मे प्रकाशित लेखों का संग्रह
युगंधरा : महिला सक्षमीकरण विषय पर लेखन स्पर्धा में प्राप्त लेखों का
संकलन व संपादन
रेडिओ एवं टीव्ही माध्यम में प्रस्तुती :
बूंद बूंद की बात : ऊर्जा संरक्षण तथा पेट्रोलियम संरक्षण जैसे गहन वैज्ञानिक
विषयों की नाट्य रूपमे रेडियो पर संकल्पना व (पुस्तक)
ऐसे 180 कार्यक्रमों की मालिका ऑल इंडिया रेडियो से चलाई.
(पुस्तक) बूंद बूंद की बात : साथ ही उनमेसे 20 नाट्य पुस्तक रूपमे प्रकाशित--2004
खेल खेल में बदलो दुनिया : DD-1 के लिये ऊर्जा व पेट्रोलियम संदक्षण जैसे गहन
वैज्ञानिक विषयपर आधारित प्रति आधे घंटे की मालिका
150 एपिसोड की संकल्पना एवं प्रस्तुती.
संरक्षण योग : भगवत्‌ गीता के "योग: कर्मसु कौशलम्‌" संदेश को
पर्यावरण सुरक्षा व ऊर्जा संरक्षण से जोडते हुए कर्म-कुशलता का
संदेश देनेवाली प्रति 15 मिनिट की मालिका में 75 एपिसोड
संकल्पना एवं प्रस्तुती.
संपादन : मासिक पत्रिका निसर्गोपचार वार्ता (1991 से 1994) तथा संरक्षण चेतना (2002 से 2005) का संपादन
लेख : हिन्दी में 300 से अधिक
प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र यथा हिन्दुस्तान (दिल्ली), जनसत्ता (दिल्ली), नवभारत टाईम्स (दिल्ली), राष्ट्रीय सहारा (दिल्ली ), देशबंधु ( रायपूर ), महानगर ( मुंबई), प्रभात खबर (रांची ) तथा प्रमुख मासिक पत्रिका - नया ज्ञानपीठ, हंस, अक्षर पर्व, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, समकालीन साहित्य इत्यादि मं प्रकाशित !
भाषण : हिन्दी राजभाषासे संबंधित विभिन्न करीब 20 कार्यक्रमो में अध्यक्षता अथवा
मंचीय सदस्यता एवं भाषण
संगणक मे लीप ऑफिस के माध्यम से हिन्दी टायपिंग सीखने के लिये 20 मिनिटकी फिल्म का निर्माण
सम्मान : इफको संस्थाव्दारा सम्मान एवं रु. 11,000/- का पुरस्कार.
छठवें विश्र्व हिन्दी संम्मेलन सुरीनाम में भाग लेकर
क) कम्प्युटर मे हिन्दी के प्रयोगसंबंधी चर्चा में सहभाग व भाषण
ख) युनायटेड नेशन्स मे हिन्दी प्रस्थापित करते हेतु चर्चा मे सहभाग

भाषा - ज्ञान :
हिन्दी, मराठी, बंगाली, नेपाली, मैथिली, भोजपूरी, पंजाबी, गुजराथी, उडिया और
कोंकणी भाषाओं का ज्ञान.
इसके अलावा मराठी एवं अंग्रेजी में भी कई पुस्तके तथा 200 से अधिक लेख प्रकाशित
वेबसाईट हिन्दी और अंग्रेजी में -- http:// www.leenamehendale.com से देखी जा सकती है।
---------------------------------------------------------------------------
हिंदी और सारी भारतीय भाषाओं के लिये तत्काल जो करने की आवश्यकता है, वह है संगणक के लिये भारतीय वर्णमाला का प्रामाणिकीकरण और अपने फॉण्टसेटस् के सोर्सकोड को प्रगट करना | भारतीय लिपि संगणक पर चढाने के लिये अब तक कइयों ने कई फ़ॉण्टसेट बनाये, उनके लिये आवश्यक कुज्जियाँ भी बनाईं. लेकिन उन्हें टॉप सीक्रेट घोषित कर व्यापार किया | खुद भारत सरकार की संस्था सी-डॅक ने ऐसे कई फॉण्टसेट बनाये और सबकी अलग-अलग मार्केटिंग करके पैसा कमाने के चक्कर में उनका एक-दूसरे से कोई मेल नहीं रख्खा | इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हिंदी का कोई भी कुग्जीपटल लेकर आप छाती ठोककर नही कह सकते की यह दुनियाँ के हर संगणक पर पढा जा सकेगा | फलत: आज विश्वके सभी प्रगत संगणकोंपर क्लिक के एक बटन से आपको चीनी, अरेबिक, हेब्रु, स्वाहिली, रशियन जैसी क्लिष्ट लिपियाँ मिल जायेंगी- लेकिन कोई भी भारतीय भाषा देखने को नही मिलेगी| भला हो लीनक्स जैसी विदेशी कंपनी का (स्वदेशी वाले ध्यान दें) जिसने भारत की उसी सरकारी संस्थाको पैसे देकर हर भारतीय भाषा के लिये एक-एक फॉण्ट बनवाया, वह भी इस तरह कि हर भारतीय लिपी के लिये वर्णमाला का एक अक्षर एक ही जगह हो | फिर यह फाण्टसेंट उन्होंने अपनी तरफसे दुनियाँ भर के लिये ओपन कर दिया, आज वह कुछ कुछ अधूरा सही, फिर भी युनिकोड का हिस्सा बन गया | इससे मजबूर होकर मायक्रोसॉफ्ट को भी वही फॉण्टसेट अपनी सिस्टम में अपनाना पड़ा ताकि इंडियन मार्केट हाथसे न निकल आये | गुगल, याहू इत्यादि पर यह हिंदी फॉण्टसेट मंगल नाम से उपलब्ध है और इसको प्रयुक्त कर लिखा गया कोई भी परिच्छेद एक क्लिकभरसे मलयाली, बंगाली इत्यादि लिपियोंमें उपलब्ध हो जाता है| इसके बावजूद भारत की फॉण्ट विकसित करनेवाली कोई भी कंपनी या स्वयं सरकारी कंपनी अपने बाकी फॉण्ट-सेट का सोर्स-कोड ओपन नही कर रहे। यदि वे करें तो भारतीय भाषाई क्षेत्र में काम करनेवाले लाखों-करोडों प्रकाशकों और पाठकों को फायदा मिले| भाषाएँ बचाने के लिये केवल देशप्रेम के अलावा यह बाजार- नियोजन भी आवश्यक है लेकिन अफसोस कि इस खतरे से न तो भाषाप्रेमी अवगत हैं, न सरकार चिन्तित है| अब तो यह सलाह दी जाने लगी है कि हमने तो फोनेटिक तरीका भी बनाकर आपके देशको दिया है, सो अपनी लिपियों का आग्रह छोड दें। हिंदी का गौरव बनाये रखने के लिये यह अत्यावश्यक है कि संगणक की युग-प्रवर्तक तकनीक का फायदा हमारी भाषा को मिले | इसके लिये हर भाषाप्रेमी को चेतना पडेगा।
-- लीना मेहेन्दले, दि. 2 अक्तूबर, गांधी जयंति, 2009

Monday, September 28, 2009

कामाच्या ठिकाणी महिलांचे लैंगिक शोषण थांबविण्यासाठी

कामाच्या ठिकाणी महिलांचे लैंगिक शोषण थांबविण्यासाठी प्रयत्न
(विशाखा गाईड लाईन्स)
कामाच्या ठिकाणी होणार्‍या लैंगिक सतावणूकीस प्रतिबंध करण्यासाठी 1992 चा रिट विनंती अर्ज (सीआरएल) क्र.666-70/92 मध्ये दिनांक 13 ऑगस्ट, 1997 रोजी मा.सर्वोच्च न्यायालयाने दिलेला निर्णय “विशाखा जजमेंट” या नावाने सुपरिचित आहे. जोपर्यंत महिला कर्मचार्‍यांच्या लैंगिक शोषणाबाबत केंद्र शासन आवश्यक असा कायदा पारित करीत नाही तोपर्यंत ही मार्गदर्शक तत्वेच कायदा समजून मालकांवर आणि शासनांवर बंधनकारक राहतील, असेही न्यायनिर्णयात स्पष्ट करण्यात आले आहे. केंद्र शासनाने अद्यापि लैंगिक शोषणासंदर्भातील विधेयक 2007 अंतिमरित्या पारित केलेले नाही.
लैगिक छळवादामध्ये खालील बाबीचा समावेश होतो :-
अ) शारिरीक संपर्क आणि कामोद्द्‌ीपिक प्रणयचेष्टा
ब) लैगिक सौख्याची मागणी अथवा विनंती
क) लैगिक वासनेने प्रेरित वाटतील शेरे
ड) कोणत्याही स्वरुपातील संभोग वर्णन / संभोग दर्शन / अश्लील सहित्यांचे प्रदर्शन
इ) कोणतेही अन्य अशोभनीय शारिरीक शारिरिक तोंडी अथवा सांकेतिक आचारण
मा.सर्वोच्च न्यायालयाने दिलेल्या न्यायनिर्णयातील मार्गदर्शक तत्वे केंद्र शासनाकडून प्रसृत करण्यात आली आहेत. सदर मार्गदर्शक सूचनांच्या अनुषंगाने दि.19 मे 99 च्या शासन निर्णयान्वये शासन सेवेतील महिलांसाठी “ राज्यस्तरीय महिला तक्रार निवारण समिती” गठीत करण्यात आली आहे. या समितीचे कामकाज सर्वोच्च न्यायालयाने दिलेल्या मार्गदर्शक सूचनांच्या अनुषंगाने करण्यात येते.
याबाबत विभाग प्रमुखाने करावयाची कार्यवाही त्याचप्रमाणे सर्व शासकीय /निमशासकीय कार्यालयात महिला तक्रार निवारण समित्या गठीत करण्याबाबतची कार्यवाही करण्याच्या संदर्भात दिनांक 19.9.2006 रोजी सर्व समावेशक आदेश निर्गमित करण्यात आला आहे व त्यामध्ये सर्वोच्च न्यायालयाच्या आदेशांचे काटेकोरपणे पालन करुन महिलांना सुरक्षिततेच्या दृष्टीने तसेच त्यांच्यावर लैंगिकदृष्टया अन्याय होणार नाही याची दक्षता घेण्याबाबत सूचना देण्यात आल्या आहेत. श्रीमती लीना मेहेंदळे, प्रधान सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग या समितीच्या अध्यक्षा असून भारतीय प्रशासन सेवा आणि भारतीय पोलीस सेवेतील वरिष्ठ अधिकारी या समितीचे सदस्य आहेत. याशिवाय सदर समितीत अशासकीय सदस्यांचा देखील अंतर्भाव करण्यात आला आहे. दि.19.5.99 च्या शासन निर्णयानुसार समितीच्या कार्यकक्षेमध्ये शासनाला यासंबंधी केलेल्या कामाचा वार्षिक अहवाल सादर करण्यात येतो.
ज्यावेळी एखादी तक्रार क्षेत्रीय कार्यालयाच्या ठिकाणी उद्भवते, अशावेळी सदर ठिकाण्याच्या कार्यालयाप्रमुखाची सदर तक्रारीची दखल घेऊन त्यासंदर्भात निराकरण करणे ही प्रमुख जबाबदारी येते. सर्व कार्यालयांमध्ये महिला तक्रार निवारण समिती असणे आवश्यक आहे. अशा समितीमध्ये अध्यक्षाही महिलाच असणे आवश्यक आहे. समितीमध्ये किमान 50 टक्के सदस्य हे महिला असावेत व एका तरी सदस्य अशासकीय असणे आवश्यक आहे. अशा समितीसमोर सदर तक्रारीच्या अनुषंगाने सुनावणी होते .सदर समितीकडून करण्यात येणारी चौकशी ही गुप्त स्वरुपाची ( इन कॅमेरा ) तसेच समरी एन्क्वायरी असते. सुनावणी दरम्यान सर्व संबंधितांचे जाबजबाब नोंदविल्यानंतर समिती आपला निष्कर्ष नोंदवून आपला चौकशी अहवाल संबंधित कार्यालय प्रमुखास सादर करते. कार्यालय प्रमुखाने सदर अहवालावर तो अहवाल विभागीय चौकशी अहवाल आहे असे समजून शिस्तभंगविषयक कार्यवाही करणे आवश्यक आहे. तत्पूर्वी समितीने आपला अहवाल कार्यालय प्रमुखास सादर केल्यानंतर कार्यालयाप्रमुखाने सदर अहवाल संबंधित मंत्रालयीन प्रशासकीय विभागास व राज्य स्तरीय महिला तक्रार निवारण समितीला सादर करणे बंधनकारक आहे. असा अहवाल राज्य स्तरीय समितीकडे प्राप्त झाल्यानंतर अहवालामधील चौकशी inadequate आहे असे वाटल्यास अथवा अनियमितता लक्षात आल्यास संबंधित प्रशासकीय विभाग प्रमुखास साक्षासाठी बोलाविते व आवश्यक असल्यास त्यानुंसार चौकशी अहवाल फेरचौकशीसाठी पुन्हा संबंधित क्षेत्रीय समितीकडे पाठवते. राज्य स्तरीय महिला तक्रार निवारण समितीच्या शिफारशीनुसार करण्यात येणारी कार्यवाही दोन महिन्यात पूर्ण करुन त्याबाबतचा अनुपालन अहवाल समितीस पुन्हा सादर करणे आवश्यक असते.
तक्रार निवारणाची जबाबदारी प्रामुख्याने क्षेत्रीय कार्यालयाची व विभागीय सचिवांची आहे. ज्या विभागात तक्रारी जास्त असतील अशावेळी संबंधित विभागाच्या सचिव व त्यावरील दर्जाच्या अधिकार्‍यांना बोलावण्यात येऊन त्यांनी तक्रारीत नमूद केलेल्या अधिकार्‍यांविरुध्द /कर्मचार्‍यांविरुध्द कोणती कार्यवाही केली आहे याचा आढावा घेण्यात येतो. विभाग प्रमुखांमार्फत दोषी अधिकारी/कर्मचार्‍यांवर समितीच्या शिफारशीनुसार कारवाई करण्यात येते.
1) या विभागाच्या दिनांक 6 फेब्रुवारी, 2001 च्या शासन परिपत्रकान्वये राज्य शासनाच्या सर्व प्रशासकीय विभाग व त्यांच्या अधिपत्याखालील सर्व कार्यालयांना त्यांच्या सेवा नियमांत सुधारणा करण्यासंबंधी निर्देश दिलेले आहे.
2) मुंबई औद्योगिक रोजगार नियम, 1959 मध्ये, महिलांचे लैंगिक शोषणापासून संरक्षण देण्यासाठी सुधारणा करण्यात आलेली आहे.
3) दि.19.12.2006 च्या शासन निर्णयान्वये मंत्रालयीन विभाग व त्यांच्या अधिपत्याखालील शासकीय /निमशासकीय कार्यालये महामंडळे येथ्‌े गठीत करण्यात आलेल्या महिला तक्रार निवारण समितीच्या नियुक्त अध्यक्षांच्या बैठकीबाबतचा वार्षिक कार्यक्रम (अवेरनेस प्रोग्राम) ठरविण्यात आला आहे व त्यानुसार दि.31.1.2008 रोजी भारतीय लोकप्रशासन संस्थेमार्फत सदर विषयासंबंधी प्रशिक्षण वर्ग आयोजित करुन सुरुवात झाली आहे.
4) मंत्रालयीन विभाग (खुद्द) तसेच त्यांच्या अधिनस्त असलेल्या कार्यालयांमध्ये महिला तक्रार निवारण समित्या गठीत करण्यात आलेल्या आहेत.
5) शासन स्तरावरुन तक्रारी संदर्भात कालमर्यादेत मार्गदर्शक सूचना देण्यात आलेल्या आहेत.
6) महिला कर्मचार्‍यामध्ये त्याच्या हक्काबाबत जाणीव जागृती निर्माण करण्यासाठी अवेरनेस प्रोगाम घोषित करण्यात आलेला आहे.
7) पोलीस विभागामार्फत सर्व पोलीस आयुक्तालय व जिल्हयामध्ये महिला सहाय्य कक्ष स्थापन करण्यात आलेले असून त्यांना नेमून दिलेल्या अन्य कामामध्ये कामाच्या महिलाची होणारी लैगिक छळवणूक हे ही काम सोपविण्यात आलेले आहे.
वरील वस्तुस्थितीवरुन असे स्पष्ट होईल की, ठरावात मांडण्यात आल्याप्रमाणे यापूर्वीच राज्य शासनाने विशेष यंत्रणा निर्माण केलेली असून त्यानुसार कामकाज करण्यात येते.

मंत्रालयातील एकून प्रशासकीय विभागाची संख्या 27
राज्यातील एकूण जिल्हे 35
सर्व जिल्हाधिकारी व जिल्हा परिषदा यांचे ठिकाणी 100 टक्के
समित्यांची स्थापना करण्यात आली आहे.
अन्य क्षेत्रिय कार्यालयात ज्या ठिकाणी समित्या स्थापन केलेल्या
नाहीत तेथे समित्यां स्थापन करण्याबाबत पाठपुरावा करण्यात येत आहे.
---------------------------------------------------------------------------

एक शहर मेले त्याची गोष्ट flap matter

श्रीमती लीना मेहेंदळे ह्या एक कुशल प्रशासक, जागरूक विचारवंत आणि हिंदी व मराठी भाषेतील सिध्दहस्त लेखिका म्हणून ओळखल्या जातात. त्यांचे लेखनाचे विविध विषय आहेत राष्ट्र चिंतन, प्रशासन, समाज, बाल साहित्य, स्त्री-विचार, निसर्ग, ऊर्जा, विज्ञान आणि आयुर्वेद. आधुनिक भारतीय लेखकांच्या यादीत त्यांचे लेखन एक विशेष स्थानाचे मानले जाईल. महाराष्ट्रात जन्मलेल्या पण बिहारमध्ये शिकलेल्या व मोठ्या झालेल्या श्रीमती मेहेंदळे यांना संस्कृत तथा अन्य कित्येक भारतीय भाषांचे ज्ञान आहे. त्या एक उत्तम वाचक आहेत सोबत भाषांतर कलेतही त्यांचा विशेष हातखंडा आहे. त्यामुळे भाषांतरामधे त्यांनी फार मोठे योगदान दिलेले आहे.

मेहेंदळे यांनी आजपर्यंत चारशेपेक्षाही अधिक समाज प्रबोधनावर लेख लिहिलेले आहेत. त्या एक उत्तम वक्ता असून जनसामान्यांपुढे वेळोवेळी प्रशासन संदर्भात त्यांनी शंभरपेक्षाही अधिक भाषण दिलेली आहेत. मराठी वृत्तपत्रात लोकसत्ता, महाराष्ट्र टाइम्स, सकाळ, गांवकरी व हिंदी वृत्तपत्रात नभाटा, जनसत्ता, हिंन्दुस्तान, महानगर, प्रभात खबर, देशबन्धु आणि मासिक पत्रिकांमध्ये अंतर्नाद साप्ताहिक सकाळ, कथादेश, इंद्रप्रस्थ, अक्षरपर्व, समकालीन साहित्य, बालभारती, देवपुत्र, नंदन, स्नेह इत्यादि मध्ये अविरत लेखन करीत आहेत.

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेते कवि श्री. कुसुमाग्रज यांच्या 108 कवितांचे सुंदर आणि समर्थ भाषांतर मेहेंदळे यांनी केलेले आहे. त्या व इतर अनेक कवितांचे हिंदी व मराठी भाषांतर त्यांच्या वेबसाईटव ब्लॉग वर उपलब्ध आहे.

आज हिंदी भाषेबरोबरच सर्व भारतीय भाषा इंग्रजी भाषेच्या तुलनेत मागे पडलेल्या आहेत. त्यांना पुढे कसे आणता येईल यासाठी संगणकाच्या सुविधांबाबत श्रीमती मेहेंदळे ठोस उपाययोजना करीत आहेत. त्यांनी ऊर्जा व सुरक्षा या विषयावर तीन वर्षे चाललेल्या बूँद बँूद की बात (रेडिओ) आणि खेल खेल में बदलो दुनिया (दूरदर्शन) या साप्ताहिक मालिकांचे आयोजन व संपादन केले. त्या आकाशवाणी व दूरदर्शनवर ब-याच कार्यक्रमांत नियमित सहभागी असतात.

त्यांच्या बहुविध प्रतिभेचे दर्शन व लेखनातील वेगळेपणा त्यांच्या आतापर्यंत प्रकाशित झालेल्या वीस पुस्तकातून प्रत्ययाला येतो.

एक शहर मेले त्याची गोष्ट हा त्यांच्या भाषांतरित कथांचा (कांही कथा त्यांच्या) दुसरा संग्रह आहे.

--- XXX ---

Sunday, September 27, 2009

वाचन

लीना मेहंदळे
लहानपणी आपण जे वाचतो, ऐकतो नि पाहतो ते आपल्या स्मृतीमध्ये स्कॅन केल्यासारखं राहतं. त्यातील एखाद्या भावलेल्या गोष्टीसंबंधी विचार आपल्या नकळत चालू राहतात. माझे वडील संस्कृतचे प्राध्यापक होते. त्यांच्या पुस्तकाच्या संग्रहातून मी महाभारत काढून वाचलं होतं. `यक्षप्रश्ना`चा भाग खास करून त्यातील दोन प्रश्नांची उत्तरं माझ्या मनात ठाण मांडून बसली होती. याच विषयावरील एक पुस्तक हाती लागलं ते म्हणजे- आचार्य निशांतकेतूलिखित `सनातन यक्षप्रश्न` हे हिंदीतील पुस्तक. या पुस्तकात महाभारतातल्या याच संदर्भाचे विवेचन आहे.

द्युतात राज्य हरून पांडव वनवासी होतात. एक दिवस त्यांच्याकडं एक ऋषि येतात. `यज्ञाच्या तयारीत एक हरीण वारंवार येऊन अडथळा आणतंय. त्या हरीणाचा बंदोबस्त करा, अशी विनंती ऋषिवर्य करतात. हरीणाचा पाठलाग करता करता या पाच भावंडांना तहान लागते. पाण्याच्या शोधार्थ सहदेवास पाठवलं जातं. तो येत नाही, म्हणून पाठोपाठ नकुल, अर्जुन, भीमास पाठवलं जातं. अखेरीस युधिष्ठिरच त्यांचा शोध घेत घेत एका तळ्यापाशी पाणी प्यायला जातो. तिथं हे चारहीजण मृतप्राय अवस्थेत पडलेले दिसतात. त्यांचा विचार करता करता तो तळ्यापाशी पाणी प्यायला जातो. तेवढ्यात यक्षाचा आवाज येतो की, `माझ्या प्रस्नांची योग्य उत्तरं दिल्याखेरीज पाणी पिता येणार नाही. तसं केलंस तर तुझ्या भावांसारखीच तुझी स्थिती होईल.` हे ऐकल्यावर युधिष्ठिर नम्रपणं म्हणाला की, `मी तुमच्या प्रश्नांना माझ्या ज्ञानानुसार जमतील तशी उत्तरं देण्याचा प्रयत्न करेन.`

यक्षाने युधिष्ठिराला विचारलेल्या एकेका प्रश्नात 2-3 उपप्रश्नांचा समावेश होता. असे एकूण 36 मुख्य प्रश्न विचारण्यात आले. प्रश्नांची समर्पक उत्तरं मिळाल्याने यक्ष प्रसन्न झाला. `शेवटच्या प्रश्नाचं उत्तर व्यवस्थित दिलंस तर पाणी प्यायला देईन,` असं तो म्हणाला. या शेवटच्या प्रश्नातही काही उपप्रश्न होतेच. `माणसाने जावी अशी चांगली वाट कोणती?` यावर `ज्या रस्त्याने पूर्वीची आदर्श माणसं गेली ती वाट चोखाळावी,` हे युधिष्ठिराचं उत्तर `महाजनो येन गत: स पंथ:` अजूनही प्रसिद्ध आहे. पुढचा प्रश्न होता- `जगातलं सगळ्यात मोठं आश्चर्य कोणतं?` याचं उत्तर होतं की, `रोजच्या रोज माणसं मरताना समोर दिसत असूनही माणूस संपत्ती साठवायच्या मागे असतो.` यावर यक्ष खुश झाला आणि पाणी प्यायची परवानगी देऊन शिवाय चारपैकी एका भावाला जिवंत करण्याचा वरही त्यानं दिला. युधिष्ठिराने नकुलाला जिवंत करण्यास सांगितलं, तेव्हा यक्षालाही आश्चयर्य वाटलं. त्यानं `भीमार्जुनासारख्या बलाढ्य भावांऐवजी नकुल कशाला?` असा प्रश्न विचारला. यावर युधिष्ठिराने, `माझी न्यायबुद्धी सतत जागरूक रहावी, माझ्या दोन आई कुंती आणि माद्री मला सारख्याच आहेत. कुंतीपुत्र मी, तसाच माद्रीपुत्र नकुलही जिवंत रहावा, असं माझी न्यायबुद्धी मला सांगते,` असं सांगितलं. यावर संतुष्ट होऊन यक्षाने चारही भावांना जिवंत केलं. आपली न्यायबुद्धी जागरूक असेल तर त्याचं फळ लगेच मिळतं, हेच यातून दिसतं. या गोष्टीतून युधिष्ठिराचे न्यायप्रियता, सत्यवादी असे गुण सामोरे येतात. महाभारतातल्या टॉपटेन प्रसंगांपैकी हा एक प्रसंग म्हणावा लागेल.

वाचायला सोपं आणि सहज असणा-या या पुस्तकात शब्दांचे अर्थ आणि मीमांसाही करण्यात आली आहे. या पुस्तकाची चांगली 2-3 वेळा पारायणं करायचेत... तरच त्यातल्या गहन अर्थाचे कण तरी हाताशी गवसतील.